आतंकवाद की राजनीति और मीडिया
क्या आतंकवाद बौद्धिक स्तर पर इतना विकसित हो चुका है कि उसका राजनीतिक धरातल तैयार हो सके? इस जटिल प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है. जो लोग अल-कायदा को आतंकी संगठन बताकर उसके खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं वे भी शायद इसे इस्लामिक चरमपंथ कहना ज्यादा मुनासिब समझेंगे बनिस्बत कि आतंकवाद के दर्शन में निहित राजनीति को मान्यता प्रदान करें. लेकिन मुस्लिम देशों में आतंकी गतिविधियों के द्वारा दुनियाभर में थरथराहट पैदा करनेवाले इस्लामिक विद्वान इसे उस राजनीति की प्रतिक्रिया मानते हैं जिसके वैचारिक आक्रमण के कारण इस्लाम को खतरा पैदा हो गया है. शायद इसीलिए "जिहाद" जरूरी हो गया था.
भारतीय परिवेश में आतंकवाद की समझ उस अमेरिकी सोच का जूठन है जो 9/11 के बाद पैदा होता है. नब्बे के दशक तक कश्मीर, पंजाब और मुंबई के कुछ महानगरों पर आतंकी कार्रवाइयां झेल चुका भारत आतंकवाद शब्द को प्रचलन में नहीं ला पाया था. लेकिन 9/11 की घटना को पश्चिमी मीडिया ने दुनिया की सबसे भीषण आतंकी कार्रवाई के रूप में प्रचारित किया और अलकायदा को दुनिया का सबसे बड़ा आतंकी संगठन घोषित कर दिया. जार्ज डब्ल्यू बुश जूनियर ने जस्टिस शब्द को इतनी बार चबाया होगा कि लोग भी भूल गये कि जिस इस्लामिक जिहाद को आतंकवाद कहकर स्थापित किया जा रहा है वह भी एक प्रकार का जस्टिस ही है. लेकिन राजनीति की इस आतंकी कूटनीति में अमेरिका दुनिया के उन इस्लामिक देशों पर भारी पड़ गया जो आक्रमण के दकियानूसी तरीकों को हथियार के साथ इस्तेमाल कर रहे थे. आतंकवाद की वैश्विक राजनीति भी संभवत: यहीं से शुरू हुई जिसमें आतंक का शिकार भारत हाशिये पर ही बना रहा.
अमेरिका और इस्लामिक दुनिया के बीच शुरू हुई इस राजनीति के नौ साल बाद पहली बार आतंकवाद की राजनीति में भारत के अंदर चर्चा तब शुरू हुई जब मालेगांव विस्फोट में कुछ हिन्दुओं को गिरफ्तार किया गया. साध्वी प्रज्ञा की गिरफ्तारी से लंबे समय तक सकते में रहे भारत के स्वघोषित राष्ट्रवादी संस्थाओं ने धीरे धीरे अपने आपको किनारे करना शुरू कर दिया. लेकिन केन्द्र सरकार के गृहमंत्री ने "भगवा आतंकवाद के बढ़ते प्रचलन" पर चिंता प्रकट करके देश में नये सिरे से बहस पैदा कर दी. अभी तक भारत में जिस आतंकवाद को राजनीति का विषय नहीं बनाया गया था उसे पी चिदम्बरम ने पूरी कर दी. याद करिए अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर मनमोहन सिंह के पहले कार्यकाल तक आतंकवाद के सवाल पर लगभग सभी राजनीतिक दल एका बनाये हुए थे. लेकिन दूसरे कार्यकाल में कांग्रेस के अंदर जो सत्ता संघर्ष पनपा है उसने आतंकवाद को राजनीतिक हथियार के रूप में सामने ला खड़ा किया है. खुद कांग्रेस के अंदर एक वर्ग अपना ही विपक्ष हो जाने की योजना पर काम कर रहा है और हिन्दू तथा हिन्दुत्व का दो स्वरूप बताकर एक स्वरूप को आरएसएस से जोड़कर उसे आतंकी गतिविधियों से जोड़ने की कोशिश कर रहा है और हिन्दू के भगवा को अपनी वृहत राजनीति के साथ मिला लेने के लिए आतुर है. क्या भारत में यही आतंकवाद की राजनीति है जो रंगहीन, गंधहीन, स्पर्शहीन होने की बजाय रंगयुक्त, गंधयुक्त और स्पर्शयुक्त हो गयी है?
दिल्ली में तो नहीं लेकिन दिल्ली से दूर भोपाल में "आतंकवाद की राजनीति और मीडिया" विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन इस दिशा में महत्वपूर्ण शुरूआत जान पड़ती है. स्पंदन नामक एक गैर सरकारी संस्था ने इस कार्यक्रम का आयोजन किया था और उस विषय पर बोलने के लिए वक्ताओं को आमंत्रित किया जो तात्कालिक तौर पर बहुत प्रासंगिक है. इस संगोष्ठी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व प्रवक्ता राम माधव और दोपहर का सामना के कार्यकारी संपादक प्रेम शुक्ल उपस्थित थे. दोनों ही वक्ता भगवा आतंकवाद पर बोलने खड़े हुए तो एक खास फर्क नजर आया. मसलन राम माधव पूरी तरह इस बात से बचे कि भगवा आतंकवाद के साथ संघ का नामकरण नहीं किया जाना चाहिए. इसके लिए संघ के अपने तर्क और विश्लेषण हैं. लेकिन भगवा आतंकवाद के एक शब्दमात्र ने संघ को सुरक्षात्मक स्थिति में ला खड़ा किया है. नहीं तो अब तक संघ के कार्यकर्ता अक्सर यह तर्क दिया करते थे कि यह सच है कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं है लेकिन ऐसा क्यों है कि हर आतंकवादी मुसलमान है? भगवा आतंकवाद शब्द का प्रयोग करके गृहमंत्री ने राजनीतिक रूप से ही सही, संघ और उससे जुड़े संगठनों को बैकफुट पर कर दिया है. लेकिन क्या संघ का बैकफुट पर जाना उसकी अपनी स्वीकारोक्ति है कि वह भगवा आतंकवाद को पोषित करता है? जवाब संघ की ओर से नहीं बल्कि एक अन्य हिन्दुवादी राजनीतिक दल शिवसेना के मुखपत्र सामना के संपादक प्रेम शुक्ल देते हैं. वक्ता के बतौर बोलते हुए उन्होंने कहा कि "आतंक का रंग निर्धारण करने से पहले आतंक के ढंग को समझना होगा. इस ढंग को समझने के लिए जिस आंख की जरूरत है उसका भारत में सर्वथा अभाव है. वह आंख कुछ और नहीं बल्कि मीडिया है." इस मीडिया का भारत में आतंकवाद को कैसा स्थान मिला है इसका एक उदाहरण उसी कार्यक्रम के अगले दिन की रिपोर्टिंग से अखबारों को देखकर मिला जब अखबारों ने एक टोंकाटांकी को आतंक पर हुई बहस से बड़ा विषय मान लिया. भारतीय मीडिया का चरित्र में इस मामले में नासमझी वाला है. अगर हमारे नेताओं के पास ही कोई विश्वदृष्टि नहीं है तो पत्रकारों से उम्मीद करना कि वे आतंकवाद की वैश्विक उपस्थिति को आंकने के लिए अपनी कोई वैश्विक दृष्टि विकसित कर लेंगे, थोड़ी नासमझी होगी.
जिन्हें हम विश्वदृष्टिवाला पत्रकार मानते हैं जरा उनका नजरिया देखिए. कुलदीप नैय्यर ने पाकिस्तान से प्रकाशित होनेवाले एक अखबार डॉन में 19 फरवरी 2010 को एक लेख लिखा. लेख में उन्होंने देश में बढ़ते हिन्दू आतंकवाद पर चिंता व्यक्त करते हुए लिखा है कि "More worrisome are the Hindu extremists rearing their head. The murder of police officer Hemant Karkare, who was probing the Malegaon blasts, was the doing of the Vishwa Hindu Parishad or Bajrang Dal." यह कुलदीप नैय्यर हैं जो अपनी ओर से ही भारतीय अदालत को धत्ता बताए हुए दुनिया को बता रहे हैं कि हेमंत करकरे को कसाब ने नहीं बल्कि विश्व हिन्दू परिषद के लोगों ने मार दिया जबकि उस घटना का एकमात्र प्रत्यक्षदर्शी सिपाही बयान दे चुका है कि कसाब ने ही तीनों पुलिसवालों की हत्या की थी जिसमें हेमंत करकरे भी शामिल थे. लेकिन भारतीय राजनीति और मीडिया में आतंकवाद की राजनीति कुछ इसी अंदाज-ए-बयां से मौजूं हैं और हम तमाशाई मानसिकता वाले लोग तमाशा देखकर ताली बजा देते हैं. ऐसे राजनीतिक हमलों से भले ही राममाधव यह कहते हुए रक्षात्मक हो जाते हों कि "कुछ इक्का दुक्का बम धमाकों को आप हिन्दू आतंकवाद नहीं कह सकते तो उनका तर्क बहुत कमजोर और भोथरा नजर आता है. प्रेम शुक्ल कहते हैं कि भारत की विश्वदृष्टि आतंकी कार्रवाईयों द्वारा विश्व पर किसी धर्म विशेष का परचम फहराने की बिल्कुल ही नहीं है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि भारत कायरों और कमजोर लोगों का देश है. प्रेम शुक्ल ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही कि आतंक की वैश्विक राजनीति में भारतीय हुक्मरान और मीडिया उन्हीं शब्दावलियों का इस्तेमाल कर रहे हैं जिसको यूरोप और अमेरिका ने ईजाद किया है. यूरोप और अमेरिका सेकुलरिज्म को बल के रूप में इस्तेमाल करते हैं जबकि हमारे यहां इसका इस्तेमाल छल के रूप में करते हैं." हिन्दू या मुस्लिम आतंकवाद पर सोच विचार करनेवाले लोगों को कम से कम इतना तो विचार करना ही होगा. भारत में आतंकवाद की राजनीति जड़ न जमाने पाये इसके लिए यह बहुत जरूरी है. मीडिया की भूमिका इसीलिए इस बहस में बहुत अहम है.
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2- आतंकवाद के विरोध को साम्प्रदायिक बनाने वालों की कलई खुल जाने से वे मुँह जोरी कर रहे हैं कि चार पाँच घटनाओं से आतंकवाद को भगवा आतंकवाद नहीं कहा जा सकता। पता नहीं इनके शास्त्रों एं कितने बम विष्फोटों के बाद आतंकवाद कहने की परम्परा है और क्या ये स्वयं भी उसका पालन करते रहे हैं?
3- संघ सिर्फ, सिर्फ और सिर्फ एक राजनैतिक संघटन है जो अपनी राजनीति पर अपराधबोध का शिकार होने के कारण उसे छुपाने की कोशिश करता है किंतु समर्थन उसी राजनीति का करता है जिसमें होने से इंकार करता रहता है।
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