Tag: क्रिकेट-की-कहानी
total:
7
| displaying:
1 - 7
क्रिकेट का भांगड़ा टोपी, टीपू और लंगड़ा
मुकेश कुमार गुप्ता उर्फ एमके अगर बुकियों का किंग था तो रतन मेहता पंटर बिरादरी का बेताज बादशाह हुआ करता था। रतन मेहता ने 1990 में क्रिकेट पर सट्टा खेलना शुरू किया। वह हंस कुमार जैन, पोली और विकास सब्बरवाल नामक दिल्ली के कुख्यात बुकियों के यहां दांव लगाता था।...एमके के कारण क्रिकेट में बढ़ने लगी थी बिकने की बेताबी
मुकेश कुमार गुप्ता उर्फ एमके अजय शर्मा का लिंक पकड़ कर क्रिकेटरों के सर्कल में घुसा। अजय शर्मा ने उसका परिचय मनोज प्रभाकर से कराया था। मनोज प्रभाकर ने एमके का परिचय कई अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों से करा दिया। श्रीलंका के कप्तान अर्जुन रणतुंगा और उप कप्तान अरविंद डिसिल्वा भी मनोज प्रभाकर के माध्यम से एमके के दोस्त बन गए। अंपायर पीलू रिपोर्टर से भी मनोज प्रभाकर ने एमके की दोस्ती करा दी। कोलकाता में एक टेस्ट मैच के दौरान रिपोर्टर ने एमके को पिच और मैच के बारे में सटीक जानकारी दी। उसके बदले में एमके ने पीलू रिपोर्टर की भी जेब गरम की।...एम के का मनीगेम
एम के यानी मुकेश कुमार गुप्ता भारतीय क्रिकेट को सट्टेबाजी के दलदल में धंसाने वाला सबसे कुख्यात नाम है. चांदनी चौक के घण्टेवाला हलवाई की दुकान पर काम करनेवाले बाप के इस बेटे ने पूरे देश की क्रिकेट को पैसे का ऐसा घुन लगा दिया जो क्रिकेट की लोकप्रियता को लगातार संदेह के घेरे में घेरता रहा. एम का नाम उस समय सामने आया था जब हैंसी क्रोनिए मामले में सीबीआई पड़ताल कर रही थी. ...डायरी से डब्बे तक सट्टे का सफरनामा
भारतीय खेलों के साथ सटोरियों का संबंध दशकों पुराना है. पश्चिम बंगाल के सटोरिए फुटबाल और राजस्थान के सटोरिए हाकी पर पिछले 100 वर्षों से सट्टा लगाते आ रहे हैं. क्रिकेट पर सट्टा लगाने की परंपरा भी दशकों पुरानी है. लेकिन ये सट्टे संगठित व्यापार के रूप में 1980 के दशक में शुरू हो पाये. सटोरियों और खिलाड़ियों के बीच मैच फिक्सिंग की शुरूआत 1980 के दशक में ही हुई. 1983 में विश्वकप जीतने से पहले भारतीय क्रिकेटरों पर सटोरियों का प्रभाव न के बराबर था. 1983 में विश्वकप जीतने के बाद टेलीविजन पर क्रिकेट का बड़ा दर्शक वर्ग खड़ा हो गया था....ऐसे बिकने लगा क्रिकेट
भारत में क्रिकेट का इतिहास लगभग 100 वर्ष पुराना है। बोर्ड ऑफ कंट्रोल फॉर क्रिकेट इन इंडिया (बीसीसीआई) का गठन 1928 में हुआ था। इस संस्था में अक्सर अफसरों, नवाबों और राजनीतिज्ञों का कब्जा रहा। 1980 तक बीसीसीआई राजनीतिक तौर पर कोई महत्वपूर्ण संगठन के रूप में प्रख्यात नहीं हुआ करता था। 1982 के एशियाड खेलों तक हॉकी भारतीयों का सबसे लोकप्रिय खेल हुआ करता था। 1982 में एशियाड का आयोजन दिल्ली में किया गया।...क्रिकेट बड़ा न भइया सबसे बड़ा रुपइया
20-20 विश्वकप में भारत की बुरी पराजय के बावजूद भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) में कोई हंगामा नहीं हुआ। 2007 में जब भारतीय टीम एकदिवसीय विश्वकप में बुरी तरह हार कर लौटी थी तब मीडिया और बोर्ड सहित संसद में भी हंगामा खड़ा हुआ था। इस बार टीम के कोच गैरी कस्टर्न बयान दे रहे हैं कि विश्वकप के ठीक पूर्व आईपीएल का टूर्नांमेंट कराना भारतीय खिलाड़ियों को थकाने का सबसे बड़ा कारण बना। ...क्रिकेट और राजनीति का युगान्तकारी रिश्ता
हर आम और खास भारतीय क्रिकेट और राजनीति का दीवाना होता है। राजनीति और क्रिकेट के खेलों की सफलता और विफलता पर भारतीयों की प्रतिक्रिया भी एक सरीखी होती है। जो जीते तो सभी सिकंदर, हार गए तो साथी बंदर। 1983 का विश्वकप जीत कर लाए तो कपिलदेव महान। 1984 में इंदिरा लहर पर ही सही कांग्रेस को 415 सीटें जिता लाए तो राजीव गांधी अद्वितीय। जैसे ही कपिलदेव के नेतृत्व में टीम इंडिया हारने लगी कपिलदेव पर सट्टेबाजी तक की तोहमत लगने लगी। क्रिकेट के बारे में उनकी समझ पर सवाल उठने लगे।...
total:
7
| displaying:
1 - 7
- आलोक तोमर की आपबीती
- वह गुजरात जिसे आप नहीं जानते
- हिन्दू आतंकवाद का अतिवाद
- सिमी से भी खतरनाक है संघ का स्वरूप
- बाबा रामदेव का दांव
बहुत अच्छा व सच्चाईयो पर आधारित लेख है। सेकुलर भारत के निर्माँण मे ऐसे लेख का अहम योगदान होगा. संपादक- आपकी आवाज़.कांम
बहुत अच्छा व सच्चाईयो पर आधारित लेख है। सेकुलर भारत के निर्माँण मे ऐसे लेख का अहम योगदान होगा. संपादक- आपकी आवाज़.कांम
सिक्के के दुसरे पहलू की तरफ इशारा कर अनिल ज्जी ने सदा की तरह सार्थक हस्तक्षेप किया है. बहुत सशक्त लेखन. निश्चय ही लेख में ...
सिक्के के दुसरे पहलू की तरफ इशारा कर अनिल ज्जी ने सदा की तरह सार्थक हस्तक्षेप किया है. बहुत सशक्त लेखन. निश्चय ही लेख में ...
सिक्के के दुसरे पहलू की तरफ इशारा कर अनिल ज्जी ने सदा की तरह सार्थक हस्तक्षेप किया है. बहुत सशक्त लेखन. निश्चय ही लेख में ...
