Tag: मीडिया
प्रेस काउंसिल को नाखून भी उगेंगे और कांटनेवाले दांत भी आयेंगे
नई दिल्ली। नख दंतहीन संस्था के रूप में पहचाने जाने वाली संस्था प्रेस परिषद को नख-दंत युक्त बनाने की कोशिश कर रही है. इस आशय की घोषणा आज राज्यसभा में सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने की. ...मुनाफे की मानसिकता का शिकार हो गया यूएनआई
योजना भवन के पीछे स्थित यूनाइटेड न्यूज आफ इंडिया (यूएनआई) की सड़क से जैसे ही आप गुजरते हैं तो वहां यूएनआई के गेट के दोनों ओर दो तरह की बैठकें दिखती हैं. गेट के दाहिनी तरफ एक चायवाला बैठा है और बायीं ओर एक लाल बैनर के नीचे राजेश कुमार बैठे हैं. खुरदरी अधपकी दाढ़ी वाले राजेश कुमार यूएनआई वर्कर्स यूनियन के महासचिव हैं. फिर वे यहां गेट के बायीं ओर क्या कर रहे हैं? वे यूएनआई को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं....चीन के गुणगान में मगन है 'द हिन्दू'
चीन ने साठ साल किस बात के पूरे किये हैं? लोकतंत्र के? नहीं। गणतंत्र के? नहीं। कम्युनिस्ट शासन के साठ साल पूरे किये हैं और उसे मुक्ति उत्सव के रूप में मना रहा है. चीन जो करे वह चीन की बला से लेकिन इधर अपने देश में द हिन्दू अखबार जिस तरह से कवरेज कर रहा है उससे लगता है कि भारत ने गणतंत्र के साठ साल समय से पहले ही पूरे कर लिये हैं. ...क्या है सहारा समय का संकट?
मंदी के इस दौर में देश के मीडिया संस्थान संकट काल से गुजर रहे हैं यह कोई नयी बात नहीं है. एक के बाद एक मीडिया घराने चौराहे पर खड़े दिखाई दे रहे हैं. सहारा समूह का मीडिया डिवीजन भी इन संकटों से अलग नहीं है. इन दिनों सहारा समय अपने कर्मचारियों को निकालने के मसले पर जिस तरह से चर्चा में आ गया है वह सहारा में व्याप्त संकट की ओर इशारा करता है....बाजार की बेहयाई के बीच करिश्माई कलर्स
कलर्स देखते ही देखते एक साल के भीतर नंबर एक चैनल हो गया? उसने ऐसा क्या किया भारतीय मनोरंजन उद्योग को बिना कहे नैतिकता का जामा भी पहनाता है और बाजार में शीर्ष पर भी पहुंच जाता है? कलर्स की सफलता का आंकलन बहुत जरूरी है. क्योंकि अगर हम कलर्स का आंकलन नहीं करेंगे तो बाजार के बढ़ते प्रभुत्व के बीच भारतीयता को बचाये रखने के प्रयास कारगर साबित नहीं होंगे. कलर्स ने दोनों विपरीत ध्रुवों को एक साथ साधकर साबित किया है कि अपनी जमीन पर खड़े रहकर भी बाजार के साथ चला जा सकता है. ...बिकाऊ मीडिया पर दिग्गजों का दर्द
अभी तक यह दुख देश के कुछ बड़े पत्रकारों को ही था. अब वही दुख आडवाणी को भी हो गया है. आडवाणी कहते हैं कि लाखों रूपया दे दो मीडिया आपकी खबरें छाप देगा. कम से कम बीते आमचुनाव में तो यही हुआ है. चण्डीगढ़ में एक कार्यक्रम में बोलते हुए सोमवार को उन्होंने पत्रकारों के जिस पतन की बात की उस पतन को लेकर कम से कम देश के दो दिग्गज पत्रकार लगातार चितित दिखाई दे रहे हैं. एक हैं कुलदीप नैयर और दूसरे हैं प्रभाष जोशी. ...मील का 73 वां पत्थर
मिथक बन चुका वह पत्रकार अभी भी अथक दिखाई देता है. बंगाली किनारे वाली धोती पर मटके के माड़ीदार कुर्ते में गांधी शांति प्रतिष्ठान के पुरातन और सनातन व्यवस्था की अद्यतन मिसाल बन चुके इस स्रोतशाल में उस 73 साल के अदम्य उत्साही 'नौजवान' पत्रकार ने केक पर चाकू फेरा तो लगा कि उस नौजवान के मन में पैदाइश के 73 साल बाद आगे और 73 मील पत्थर पार करने की ललक शिशुवत हो चली है. वह केक काटनेवाले 'नौजवान' कोई और नहीं, भारतीय पत्रकारिता के एकमात्र जीवित स्तंभ पुरुष प्रभाष जोशी हैं. ...घराना पत्रकारों को जमाने की चिंता
इस बार उदयन शर्मा की पुण्यतिथि मनाने के लिए उनके समर्थकों के पास शायद सबसे नायाब तरीका मौजूद था. उन्होंने उनको एक संवाद के जरिए याद किया. मौका यह कि अभी हाल में ही लोकसभा चुनाव हुए हैं और लोकसभा चुनाव के दौरान मीडिया ने जिस तरह से पैसा बटोरा वह पत्रकार बिरादरी को नैतिकता इत्यादि पर बहस के लिए अच्छा मौका दे देती है. चार घण्टों के दौरान कोई 14 वक्ताओं ने धुंआधार तरीके से अपने तर्क रखे, नाराजगी दिखाई, मजबूरी भी बताई और आह्वान किया कि बदलाव जरूरी है. फिर सब बाहर निकले, चाय पी, एक दूसरे से परिचय बढ़ाया और अपने अपने काम पर वापस लौट गये. पत्रकारिता पर चिंता का उबाऊ और थका देनावाला चार घण्टा पूरा हो गया था. ...बिके सब, कोई कम कोई एकदम
हरमोहन धवन जी ने अपनी आप बीती में मीडिया के कड़वे सच से एक बार फिर परदा उठाया है। मैं इसे थोड़ा और उपर खिसकाने की जुर्रत कर रहा हूं। मैं यहां अपने पत्रकार मित्रों के मुंह से सुनी बातें भी नहीं करुंगा। मैं आपको वहीं बता रहा हूं जो अपनी आंखों से देखा है। मेरा इरादा पत्रकारों की जमात, जिसमें मैं खुद भी शामिल हूं को कठघरे में खड़ा करने का नहीं है, पर इतना जरूर कहना चाहता हूं कि जो व्यापारी करोड़ों का निवेश करेगा वह तो केवल लाभ के बारे में ही सोचेगा, लेकिन पत्रकार द्वारा उसकी हां में हां मिलाना कहां तक जायज है? सवाल आपके सामने है जबाव भी आपको ही खोजना है......चौथी दुनिया, दूसरी बार
कहा जाता है कि प्रयोग दोबारा नहीं होते. शायद ऐसा इसलिए कि एक दौर से दूसरे दौर के बीच जो अंतराल आ जाता है उसके कारण प्रयोग दोहराने की कोशिश में दम तोड़ देते हैं. अगर बात मीडिया जगत से जुड़ी हो तो यह तर्क ज्यादा मजबूत हो जाता है. लेकिन संतोष भारतीय यह करने जा रहे हैं. वे उस प्रयोग को दोहराने जा रहे हैं जिसने आज से १६ साल पहले विराम ले लिया था. वे चौथी दुनिया को दोबारा निकालने जा रहे हैं....- आलोक तोमर की आपबीती
- वह गुजरात जिसे आप नहीं जानते
- हिन्दू आतंकवाद का अतिवाद
- सिमी से भी खतरनाक है संघ का स्वरूप
- बाबा रामदेव का दांव
बहुत अच्छा व सच्चाईयो पर आधारित लेख है। सेकुलर भारत के निर्माँण मे ऐसे लेख का अहम योगदान होगा. संपादक- आपकी आवाज़.कांम
बहुत अच्छा व सच्चाईयो पर आधारित लेख है। सेकुलर भारत के निर्माँण मे ऐसे लेख का अहम योगदान होगा. संपादक- आपकी आवाज़.कांम
सिक्के के दुसरे पहलू की तरफ इशारा कर अनिल ज्जी ने सदा की तरह सार्थक हस्तक्षेप किया है. बहुत सशक्त लेखन. निश्चय ही लेख में ...
सिक्के के दुसरे पहलू की तरफ इशारा कर अनिल ज्जी ने सदा की तरह सार्थक हस्तक्षेप किया है. बहुत सशक्त लेखन. निश्चय ही लेख में ...
सिक्के के दुसरे पहलू की तरफ इशारा कर अनिल ज्जी ने सदा की तरह सार्थक हस्तक्षेप किया है. बहुत सशक्त लेखन. निश्चय ही लेख में ...

