Tag: अमेरिका
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ओबामा के बाद अमेरिका-१
ओबामा गैर श्वेत और प्रवासी निवासियों के प्रतीक हैं और अंतरराष्ट्रीयता, भूमंडलीकरण, मुक्त व्यापार, सेकुलरवाद, संकर प्रजाति और खिचड़ी संस्कृति के नायक बन बैठे हैं. जो विरोधी खेमे के अमेरिकी राष्ट्रवाद, क्रिश्चियन धर्म, संरक्षात्मक आर्थिक नीति और नैतिक मूल्यों पर भारी पड़ा. इस राष्ट्रपति चुनाव में ओबामा को अमेरिका के 34 प्रतिशत अल्पसंख्यकों के वोट, यहूदी लॉबी द्वारा संचालित मीडिया और जॉर्ज सोरोस द्वारा प्रदत्त प्रचुर वित्त का सहारा था, तो मैक्केन 66 प्रतिशत श्वेत जाति के बीच कट्टर क्रिश्चियन धर्मावलंबियों के समर्थन की आस लगाए बैठे थे। बहरहाल पलड़ा ओबामा का भारी पड़ गया....ओबामा के बाद अमेरिका-२
वित्त बाजार के धराशायी होने के फलस्वरूप अमेरिका लंबी आर्थिक मंदी के दौर में प्रवेश कर चुका है। रोजगार में छंटनी होने लगी है। सरकार करीब दो खरब डॉलर के जमानत पैकेज की परिणति से अनभिज्ञ नहीं है. इससे महंगाई कई गुना बढ़ेगी. सस्ते दामों पर उपभोग की आदी अमेरिकी जनता की इच्छाओं की पूर्ति करना संभव नहीं होगा। सरकार कंगाली की ओर बढ़ चुकी है। जनकल्याण के लिए उसके पास फंड नहीं है। उधर दो-दो युद्ध, अमीर निवेशकों के लिए जमानत, ढह रही सार्वजनिक संपत्ति का रख-रखाव, विदेशी लेनदारों की कर्ज अदायगी वगैरह के बाद जनता के लिए महज िढंढोरे ही बचेंगे। संसाधन के अभाव में अलगाववाद और गुटबाजियां बढेंगी. ...उस दिन मैं भी नेक्सन की तरह रोया था
अपने भी देश-समाज में गोरे रंग की बड़ी महिमा है. लेकिन सोलह गुण संपन्न कृष्ण को सांवरा बनाकर हमने गौर-वर्ण को फीका कर दिया. अपने यहां भी भेदभाव और ऊंच-नीच बहुत है. लेकिन किसी एक जाति के सभी लोग इसलिए भेदभाव के शिकार नहीं होते कि उनकी चमड़ी काली होती है. अपने यहां भेदभाव की कई परतें हैं. इसलिए रंगभेद उतना निंदनीय और वांछनीय नहीं होता जितना पश्चिम में होता है. ऐसे में काले ओबामा का ह्वाईट हाउस में बैठना अपने को उतना उल्लेखनीय नहीं लगता जितना अमेरिका के श्वेत-अश्वेत लोगों को लगता होगा....अमेरिकी मानस में बदलाव की आहट
राष्ट्रपति बनना तो दूर, अगर ओबामा चार-पांच दशक पहले होते तो शायद अमेरिका के किसी क्लब या होटल तक में प्रवेश नहीं कर सकते थे। उनकी ऐतिहासिक और चमत्कारिक जीत दिखाती है कि अमेरिका वाकई बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। सामाजिक-राजनैतिक क्रांतियां रक्तरंजित ही हों और गृहयुद्धों के जरिए ही आएं यह जरूरी नहीं है। इस चुनाव ने दिखाया है कि वे मतपत्रों के रास्ते से भी आती हैं। ...नो, यू कैन नाट मि. ओबामा !
गोलमेज सम्मेलन के लिए महात्मा गांधी लंदन गये तो लौटते हुए फ्रांस भी गये थे. उनके सामने प्रस्ताव आया कि आपको अमेरिका भी जाना चाहिए. बार-बार दबाव डालने के बावजूद महात्मा ने अमेरिका जाने से मना कर दिया. जब उनके पूछा गया कि आप मना क्यों कर रहे हैं तो उन्होंने कहा था अभी वह वक्त नहीं आया है कि मैं अमेरिका जाऊं. महात्मा गांधी भले ही अमेरिका न गये हों लेकिन बराक ओबामा के निजी दफ्तर में महात्मा गांधी की फोटो लगी हुई है. आर्थिक और सामाजिक भ्रंस के कगार पर खड़े अमेरिका में ओबामा का राष्ट्रपति बनते ही क्या वह वक्त आ गया है कि महात्मा गांधी जैसी चेतना कह सके कि हां, अब वह वक्त आ गया है जब मुझे अमेरिका जाना चाहिए?...इतिहास से आये ओबामा
'कोई अश्वेत भी अमेरिका का राष्ट्रपति हो सकता है यह चालीस साल पहले तो क्या चार साल पहले भी नहीं सोचा जा सकता था. पर, इस बार होगा.' चुनाव प्रचार के दौरान अपने समर्थकों को भेजे ईमेल में खुद बराक ओबामा ने यह बात लिखी थी. डेनेवर में डेमोक्रेटिक पार्टी के अधिवेशन में भी उन्होंने यही घोषणा की थी. उनकी वह बात सही साबित हुई. जो चार साल पहले नहीं सोचा जा सकता था वह आज अमेरिका की सच्चाई है. ...
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