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अप्राकृतिक संबंधों पर अनैतिक फैसला

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राज समाज चलाने के लिए कानूनों की परिधि में जीना जरूरी होता है. लेकिन नैतिक जीवन और कानून सम्मत जीवन में अगर किसी एक का चुनाव करना हो तो मनुष्य नैतिक जीवन का ही चुनाव करता है. यही समाज और व्यक्ति दोनों के हित में होता है. लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट के एक फैसले ने साबित कर दिया है कि देश की राज व्यवस्था पर ही नहीं कानून व्यवस्था पर भी अब कोई अंकुश नहीं रह गया है और हमारे देश के कानूनी संस्थान भी कुछ निहित स्वार्थी तत्वों के हाथ के खिलौने बनकर रह गये हैं.

दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरूवार को अप्राकृतिक संबंधों के बारे में एक फैसला सुनाते हुए कहा कि अगर दो वयस्क नागरिक आपसी सहमति से समलैंगिक संबंध बनाते हैं तो इसे अपराध नहीं माना जा सकता. अपने फैसले में हाईकोर्ट ने संविधान में वर्णित धारा 21 का हवाला देते हुए कहा है कि देश के सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हैं ऐसे में किसी नागरिक के निजी जीवन को उसके मुताबिक जीने से नहीं रोका जा सकता. 

हाईकोर्ट का यह फैसला कई मायनों में ऐतिहासिक है. इस फैसले से जहां "अप्राकृति संबंधों" को एक अरब नागरिकों के देश की एक अदालत ने कानूनी मान्यता देकर 150 साल पुराने कानून को उलट दिया है वहीं इस फैसले से उसने यह साबित कर दिया है कि समाज और देश अब नैतिक आचरण से नहीं बल्कि कानूनी लाबिंग के भरोसे चलेंगे भले ही वे कितने भी अप्राकृतिक और अनैतिक क्यों न हो. इस फैसले के खिलाफ हम अपील करेंगे लेकिन लोगों को यह तो पता होना चाहिए कि दिल्ली हाईकोर्ट जिस धारा 377 को खत्म करने की सिफारिश कर रहा है वह धारा आखिर कहती क्या है?

धारा 377 को समाप्त करने की हाईकोर्ट की सिफारिश का केवल गे संबंधों को मान्यता देने या न देने से ही संबंध होता इस पूरी बहस को नैतिक या अनैतिक ठहराकर बात को खत्म किया जा सकता था. लेकिन नाज फाउण्डेशन भी किसी होमोसेक्सुएल लोगों के अधिकार के लिए यह लड़ाई नही लड़ रहा था. उसकी पूरी लड़ाई धारा 377 को समाप्त करवाने की थी. अपनी याचिका में नाज फाउण्डेशन ने अपने बारे में बताते हुए कहा है कि वह एक ऐसा गैर सरकारी सगठन है जो एचआईवी संक्रमित लोगों के बीच काम करता है जिसमें वे पुरुष भी शामिल हैं जो पुरुषों के साथ संबंध रखते हैं. नाज फाउण्डेश ने केस फाईल करते हुए कहा था कि वह ऐसे पुरुषों के बीच एड्स की रोकथाम का कार्यक्रम चलाना चाहती है लेकिन उसे भारतीय दण्ड संहिता की एक धारा के कारण दिक्कत आ रही है.

हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि आखिर ऐसा क्यों हो गया कि जिस मामले पर सुनवाई करने से भी हाईकोर्ट कतरा रहा था उसी मामले में उसने ऐसा फैसला दे दिया. केन्द्र की यूपीए सरकार ने भी पिछले साल ही हाईकोर्ट में अपना जवाब दाखिल करके कहा था कि गे संबंधों को कानूनी मान्यता देने से समाज में गलत संदेश जाएगा. फिर ऐसा क्या हो गया कि हाईकोर्ट और केन्द्र सरकार दोनों ही समलैंगिक संबंधों के प्रवक्ता बन गये?

नाज फाउण्डेशन का कहना था कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 377 के कारण अप्राकृतिक संबंध रखने वाले युवक छुपकर संबध बनाते हैं इसलिए उन तक पहुंच पाना और पता लगा पाना मुश्किल होता है. ऐसे में उनके बीच एड्स की रोकथाम के कार्यक्रम चला पाना मुश्किल होता है. लेकिन सुनवाई के दौरान लगातार मांगे जाने पर नाज फाउण्डेशन एक भी ऐसा उदाहरण, डाटा या फिर तथ्य सामने नहीं ला पाया जिससे यह साबित होता हो कि गे कम्युनिटी में एड्स को लेकर हाई रिस्क जोन में आता हो. फिर भी नाज फाउण्डेशन धारा 377 को समाप्त करने की अपनी मांग पर अडिग रहा. सुनवाई के दौरान उसने जिस तरह से पैसा बहाया वह भी कई तरह के शक पैदा करता है. हर सुनवाई के दौरान मीडिया के लोगों को एक तरह से हाइजैक कर लिया जाता था और अगले दिन अखबारों में वही छपता था जो नाज फाउण्डेशन ब्रीफ करता था.

हमारे लिए यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि क्या धारा 377 गे विरोधी है? धारा 377 साफ तौर पर कहता है कि "जो कोई भी अप्राकृतिक तरीके से यौन व्यवहार करता है उसको दण्डित किया जाना चाहिए फिर वह स्त्री हो, पुरुष हो या फिर पशु." असल में तो यह कानून कहीं से भी निजी यौन व्यवहार के बारे में बात ही नहीं करता है. और यह कानून तब तक अमल में नहीं लाया जा सकता जब तक कि इस बारे में कोई शिकायत न करे और अदालत के सामने भी पूरी गवाही और साक्ष्य न प्रस्तुत किये जाएं. अब सवाल यह उठता है कि अगर यौन संबंध बनाना बेहद निजी मामला है तो फिर यह कानून गे कम्युनिटी के लिए आड़े कहां आता है? धारा 377 खुद इस बारे में व्याख्या करती है कि "शिकायत के बारे में निश्चित तौर पर सबूत होना चाहिए. यह सबूत स्थान, व्यक्ति के बारे में होना चाहिए. अगर पीड़ित इन सबूतों को सामने नहीं रख पाता है तो दोषी को सजा नहीं दी जा सकती." अगर कानून यह कहता है तो नाज फाउण्डेशन आखिर किसलिए धारा 377 को एण्टी गे बताकर इसको खत्म करने की लगातार मांग कर रही थी?

असल में धारा 377 के कारण एक बड़ी बाधा उत्पन्न होती है वह बाधा है निजता का अधिकार. जब तक यह धारा कानूनी रूप से विद्यमान है तब तक अप्राकृतिक संबंधों को सार्वजनिक मान्यता नहीं मिल सकती है. फिर भी यह कानून गे या लेसिबियन को संबध बनाने में कोई बाधा नहीं पैदा करता है. अगर निजी तौर पर कोई व्यक्ति ऐसा संबंध बनाता है तो कानून उसके मार्ग में कोई बाधा उत्पन्न नहीं करता है क्योंकि एक तो कानून उसकी निजता का पूरा ध्यान रख रहा है और दूसरे कानून तभी प्रभावी होगा जब दो में से कोई एक व्यक्ति शिकायत करे और अदालत के सामने साक्ष्य प्रस्तुत करे. लेकिन यह कानून सेक्स वर्करों के रास्ते में एक बड़ी बाधा पैदा करता है. मसलन अगर कोई पुरूष दूसरे पुरुष से सेक्स वर्कर के तौर पर संबंध बनाता है तो यह निजता के दायरे में नहीं आता बल्कि एक तरह का व्यापार हो जाता है. कानून इसे प्रतिबंधित करता है. मेरा ऐसा मानना है कि हाईकोर्ट के इस फैसले से होमोसेक्सुअलिटी को एक संस्थागत स्वरूप मिल जाएगा और गे तथा लेसिबियन संबंधों को एक व्यापारिक जामा पहनाने में अब ऐसे संस्थाओं को कोई दिक्तत नहीं होगी जिनके लिए यह एक फलता फूलता बाजार बन चुका है.

असल में दिल्ली हाईकोर्ट में धारा 377 को समाप्त करने के लिए याचिकाकर्ता ने जो भी दलीलें दी थी उनका धारा 377 से कुछ लेना देना ही नहीं है. अपनी याचिका में और बातों के अलावा नाज फाउण्डेशन ने यह मांग भी की थी कि एमएसएम (पत्नी के रहते पुरूष का पुरुष से संबंध) को कानूनी मान्यता मिलनी चाहिए. हाईकोर्ट ने अपने विस्तार से फैसले में क्या कहा है यह तो अभी पता चलना है लेकिन क्या समाज ऐसे संबंधों को मान्यता देगा? क्या समाज यह स्वीकार्यता दे देगा कि पत्नी और परिवार के बीच रहते हुए एक पुरुष दूसरे पुरुष से संबंध बनाए और पत्नी अपने ही पति को कानूनी रूप से चुनौती न दे सके? क्या हमारा समाज ऐसे किसी कानून का स्वागत करेगा?

(अंजू सिंह हाईकोर्ट में होमोसेक्सुएलटी के खिलाफ लड़ाई लड़नेवाली संस्था जैक इंडिया से जुड़ी हैं.)

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rajkumar singh on 03 July, 2009 04:57;39
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निहितार्थ हो सकते हैं लेकिन ३७७ रद्द करना समानता की मूल भावना के अनुरूप है .
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