अखबारों की कमी ब्लाग ने पूरी कर दी
प्रभाष जोशी के असामयिक निधन से हिन्दी ब्लाग जगत भी स्तब्ध है. हिन्दी ब्लाग जगत में प्रभाष जोशी को जानने या फिर उनको पढ़नेवाले ब्लागर लगातार उनके ऊपर लिख रहे हैं. हिन्दी के ब्लाग एग्रीगेटर ब्लागवाणी ने प्रभाष जी के निधन पर उनके ऊपर जो भी पोस्ट लिखी जा रही हैं उनका एक विशेष लिंक क्रियेट किया है जो ब्लागवाणी के शीर्ष पर ही मौजूद है. चिट्ठाचर्चा में भी अब तक दो बार चर्चाएं हो चुकी हैं. ब्लाग जगत में जिस तरह से प्रभाष जोशी को लेकर चर्चा हुई है उससे दैनिक जागरण और नवभारत टाइम्स की बदमाशी भी दरकिनार हो जाती है. एक चर्चा हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं.
प्रभाष जोशी नये विचार और नयेपन के लिए हमेशा तैयार रहते थे और उस्का विरोध करने की बजाय उसका स्वागत करते थे। नयी तकनीकि के घोड़े पर सवार होकर जब ब्लाग ने अपना पैर पसारा तो प्रभाष जोशी ने इसका विरोध करने की बजाय इसका स्वागत किया। वे खास कुछ समझते नहीं थे तकनीकि लेकिन इतना जरूर समझते थे कि मीडिया को लोकतांत्रीकरण हो गया है और ब्लाग उसका सबसे ताकतवर हथियार बनकर उभरा है। इसलिए प्रभाष जी के निधन पर ब्लाग जगत शोकातुर होता है, तो इसे प्रभाष जोशी को ब्लाग जगत की श्रद्धांजलि माननी चाहिए।
ब्लागवाणी की विशेष कृपा से ब्लाग जगत में प्रभाष जोशी के बारे में जो कुछ लिखा जा रहा है उसे एक स्थान पर देखा जा सकता है। प्रभाष जोशी को टैग रूप में ब्लागवाणी ने विशेष लिंक बनाया है जिसके कारण उनसे जुड़े पुराने लेख भी नत्थी हैं। बहुत दिन नहीं बीता जब उनका जन्मदिन बीता था। जन्मदिन को चार महीना भी नहीं बीता था कि प्रभाष जी नश्वर देह को छोड़कर चले गये। निधन के तीन घण्टे के अंदर ही ब्लाग जगत में पहली खबर कबाड़खाना पर आयी है। प्रभाष जोशी नहीं रहे। इसे खबर तो क्या सिर्फ सूचना कहें। सिर्फ एक लाइन। लेकिन 19 मिनट बाद एक लाइन की सूचना के बाद पूरी खबर किस्सागोई पर आ गयी. रात के 3.22 मिनट पर. राजीव मिश्रा लिखते हैं कि "अचानक रात के तीन बजे आफिस से खबर आयी कि प्रभाष जोशी नहीं रहे." और हां, तुरंत समीर लाल की टिप्पणी भी कि- हमारी विनम्र श्रद्धांजलि. कौन कहता है कि ब्लागर दिन रात सक्रिय नहीं रहते?
रात के तीन सवा तीन बजे की इन प्राथमिक सूचनाओं के बाद जैसे जैसे उजाला फैला प्रभाष जोशी के जाने की काली सूचना पर सबने अपनी श्रद्धांजलि व्यक्त की. पहली टिप्पणी दर्ज हुई अलबेला खत्री की. उन्होंने कहा - "उनके निधन से उस शम्मे उम्मीद की लौ मद्धिम हो गयी है जिसकी रोशनी में देश की पतोन्मुखी पत्रकारिता को सही दिशा दिखाकर उसकी दशा सुधारने की आस बंधी हुई थी." टिप्पणी के रूप में एक बार फिर ब्लाग जगत की श्रद्धांजलि. फिर हर्षवर्धन त्रिपाठी की टिप्पणी. हर्ष की टिप्पणी के पहले विनीत की विनती- "इन सबके वाबजूद प्रभाष जोशी को एक ऐसे कर्मठ पत्रकार के तौर पर जाना जाएगा जो कि अपनी जिदों को व्यावहारिक रुप देता है,नई पीढ़ी के लोगों को गलत या असहमत होने पर खुल्लम-खुल्ला चैलेंज करता है,अपनी बात ठसक के साथ रखता है और सक्रियता को पूजा और अराधना को पर्याय मानता है।" अब संजीत त्रिपाठी की श्रद्धांजलि. इन श्रद्धांजलियों के बीच रवीन्द्र रंजन का एक बड़ा ही महत्वपूर्ण सवाल- अब कौन करेगा कागद कारे? जवाब दिया अविनाश वाचस्पति ने- प्रभाष जोशी यहीं हैं और यही रहेंगे. लेकिन कैसे? उनकी देह गयी है, रूह नहीं.
इसके अलावा नारदमुनि का नमन, फिर संजय पटेल की सूचना कि दिल्ली जाकर भी प्रभाष जोशी कभी मालवा से दूर नहीं हुए. बिल्कुल सही है. दिल्ली में रहते हुए भी प्रभाष जोशी मालवा में रमे रहे और जब जहां जैसे मौका मिलता मालवा को याद जरूर करते. अंशु निराश हैं- प्रभाष जी के जाने से पत्रकारिता की वह पीढ़ी खत्म हो गयी जिस पर पत्रकारिता को नाज था. अंशु की निराशा बहुत भयंकर है. वे लिखते हैं- दर्जनों ऐसे हैं जो प्रभाष जोशी की पाठशाला से निकलकर संपादक बने हैं, लेकिन उनमें से एक भी ऐसा नहीं है जो प्रभाष जोशी की जगह ले सके. शायद अंशु सही कह रहे हैं. लेकिन अंशु से आप भी कहिए कि उम्मीद पर दुनिया कायम है. कमलकांत बुधकर भी आखिर कह ही रहे हैं कि हिन्दी पत्रकारिता में जमीनी जुड़ाव, सांस्कृतिक चेतना और बेलाग प्रखरता की चर्चा अब किस नाम से शुरू हुआ करेगी?
क्या आप कोई संकेत दे सकते हैं?......जवाब आप खोजिए लेकिन इरफान का कार्टून कह रहा है- चौथा खम्भा कमजोर हो गया. इसमें कोई दो राय नहीं. और आखिर में मीडियामार्ग की चुनौती- क्या रामकृपाल सिंह (नवभारत टाइम्स के संपादक) को यह खबर सिंगल कालम की भी नहीं लगी? दैनिक जागरण ने तो मेल करके एक कालम की खबर छापने की हिदायत दी थी लेकिन रामकृपाल सिंह ने ऐसा क्यों किया? (चिट्ठाचर्चा में संजय तिवारी)
(विस्फोट पर प्रभाष जी पर उपलब्ध सामग्री को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. प्रभाष जी द्वारा विस्फोट पर जो कुछ लिखा गया है उसे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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- आतंकवाद की राजनीति और मीडिया
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