भोपाल गैस काण्ड के असली अपराधी
भोपाल हादसे पर साढे पच्चीस साल बाद आये फैसले के बाद से हादसे दर हादसे घटित हो रहे हैं. पहला हादसा फैसला ही बना. दूसरा हादसा इस आरोप के साथ आया कि तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने तीन करोड़ रुपया लेकर यूनियन कार्बाइड के नान एक्टिंग सीईओ वारेन एण्डरसन को भोपाल से दिल्ली जाने दिया.
तीसरा हादसा इस खबर के साथ आया कि अर्जुन सिंह ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उन्हें दिल्ली से जो कहने के लिए कहा गया था उन्होंने वही किया. दिल्ली से उन्हें ऐसा करने के लिए कहा किसने? राजीव गांधी ने? तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने आखिर किस दबाव में अर्जुन सिंह को कहा होगा कि भोपाल गैस त्रासदी के बाद घटनास्थल पर पहुंचे वारेन एंडरसन को सकुशल वापस भेज दो इसे आसानी से समझा जा सकता है. 25 साल पहले जिस दबाव में वारेन एण्डरसन को तत्कालीन प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री ने वारेन एण्डरन को सकुशल वापस भेज दिया क्या आज वह दबाव कम हुआ है या बढ़ा है? भोपाल गैस काण्ड के अपराधियों की खोज करते समय इसी प्वाइंट से खोज शुरू करते हैं.
2-3 दिसंबर की रात खराब हवा ने जिस मिथाइल आइसोसाइनाइट के रिसाव ने हादसे को अंजाम दिया वह हाइड्रोजन साइनाइट से 500 गुना अधिक जहरीली थी. इसका "आविष्कार" पहले विश्वयुद्ध की देन थी. मिथाइल आइसोसाइनाइट को शून्य डिग्री सेन्टीग्रेट पर प्रिजर्व रखना होता है और संवेदनशीलता इतनी अधिक है कि यह अपने आप विस्फोटित हो सकता है. इतनी जहरीली गैस को भोपाल के यूनियन कार्बाइड कारखाने में निर्मित नहीं किया जाता था बल्कि उसे अमेरिका से आयात किया जाता था. जिस अमेरिका से इसे आयात किया जाता था उस अमेरिका में नियम ऐसा सख्त था कि आधा टन से अधिक मिथाइल आइसोसाइनाइट को एक साथ रखना प्रतिबंधित है. लेकिन भारत में उस वक्त लापरवाही ऐसी कि जिस टैंक से रिसाव हुआ उसमें 67 टन मिथाइल आइसोसाइनाइट रखा हुआ था. निश्चित रूप से यूनियन कार्बाइड की स्थापना के साथ ही इस बात के पुख्ता इंतजाम किये गये थे कि जहरीले रसायन के कारोबार में कंपनी को किसी प्रकार के अवरोध का सामना न करना पड़े. निश्चित रूप से इसके लिए कंपनी ने उस वक्त की समाजवादी आर्थिक व्यवस्था के साथ जमकर खिलवाड़ किया होगा. उदाहरण देखिए. 1 जनवरी 1973 में भारत सरकार ने फेरा कानून को लागू किया और तय किया कि किसी भी कंपनी में 40 प्रतिशत से अधिक विदेशी निवेश फेरा कानूनों का उल्लंघन माना जाएगा. यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन ने भारत सरकार के साथ मिलकर मिथाइल आइसोसाइनाइट का जो कारखाना स्थापित किया उसमें उसने 60 प्रतिशत शेयर अपने पास रखा.
इस पृष्ठभूमि में अगर हम भोपाल गैस त्रासदी को देखेंगे तो पायेंगे कि त्रासदी की पृष्ठभूमि जानबूझकर तैयार की गयी. अव्वल तो नियम कानून थे ही नहीं, और अगर कुछ रहे भी होंगे तो उनकी अनदेखी करना अधिकारियों और नेताओं ने अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझा क्योंकि कोई अमेरिकी कंपनी भारत सरकार के साथ मिलकर कोई कारखाना स्थापित कर रही थी. लेकिन दुर्घटना के 25 सालों बाद भी क्या परिस्थितियां बदल गयी है? जिन परिस्थितियों में उस वक्त यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन को इस बात के असीमित अधिकार दिये गये कि वह हादसे की हद तक लापरवाही बरत सकता है क्या आज कंपनियों को उससे अधिक अधिकार नहीं मिले हुए हैं? उस वक्त भी जब कंपनी के नान एक्टिंग सीईओ वारेन एण्डरसन को पता चला कि हादसा हुआ है तो हादसे के चार दिन बाद 7 दिसंबर को वे मुंबई होते हुए भोपाल पहुंचते हैं. उस वक्त प्रत्यक्षदर्शी आज बयान दे रहे हैं कि जब एंडरसन हवाई अड्डे पर पहुंचा तो उसके हाथ एक ब्रीफकेश और एक गैस मास्क था. हवाई अड्डे से ही एंडरसन श्यामला हिल्स स्थित यूनियन कार्बाइड के गेस्ट हाउस पहुंचते हैं और उन्हें चार घण्टे के लिए गिरफ्तार किया जाता है. उनके ऊपर धारा 304 ए, 304,120 बी और 429 के तहत मामला दर्ज किया गया. जिन धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया उसमें उन्हें पुलिस जमानत नहीं दे सकती थी लिहाजा गेस्ट हाउस में ही मजिस्ट्रेट को बुलाया गया और उन्हें जमानत दे दी गयी. इसके बाद मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से उन्हें राज्य सरकार का विशेष विमान मुहैया कराया गया और वे दिल्ली लाये गये. कुछ देर नार्थ ब्लाक के आस पास टहलने के बाद अपने विशेष विमान से वे अमेरिका रवाना हो गये. इन सारी परिस्थितियों के बीच क्या आप वारेन एण्डरसन को अपराधी मान सकते हैं? अगर वारेन एण्डरसन अपराधी थे तो फिर वे भोपाल क्यों गये? आखिर प्रधानमंत्री कार्यालय और मुख्यमंत्री सचिवालय नहीं चाहता तो क्या वारेन एंडरसन जो कि खुद चलकर भोपाल गये थे, वहां से भाग सकते थे? निश्चित तौर पर अमेरिकी प्रशासन ने भारत सरकार के तत्कालीन प्रधानमंत्री पर दबाव डाला होगा और अपने एक महत्वपूर्ण नागरिक को सकुशल वापस आने के लिए कहा होगा. अमेरिका का ऐसा करना आश्चर्यजनक नहीं है और न ही एंडरसन को राक्षस कह देने से गुस्सा खत्म हो जाता है. क्या राजीव गांधी, अर्जुन सिंह और तत्कालीन नौकरशाही इसके लिए जिम्मेदार नहीं है? एंडरनसन तो अपराध बोध में भोपाल गया था, फिर वहां से उसे निरपराध मानकर बाहर निकलने का अपराध किसने किया? आज पच्चीस साल बाद क्या अमेरिका का दबदबा भारतीय प्रधानमंत्री कार्यालय से खत्म हो गया है?
अगर ऐसा नहीं हुआ है तो न तो एंडरसन को गाली देने से भोपाल का पाप मिटता है और न ही अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड को दोषी कह देने से कहानी खत्म हो जाती है. यह हमारे लाखों नागरिकों की जिन्दगी का सवाल था जो किसी भी एंडरसन की इकलौती जिंदगी से ज्यादा कीमती थी. अगर अमेरिका अपने एक नौकर को बचाने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय तक को इस्तेमाल कर लेता है तो उस प्रधानमंत्री कार्यालय पर हम कब लानत भेजेंगे तो ताजा ताजा बिछी 15 हजार लाशों से गुजरकर उस एंडरसन को बाहर जाने देता है. इस घटनाक्रम के बाद पिछले पच्चीस सालों में जो कुछ हुआ वह लाशों पर की गयी भद्दी राजनीति है जो इस देश में बार बार की जाती है. मामला अदालत में गया तो भारत सरकार खुद ही पीड़ितों की पक्षधर हो गयी जो कि खुद यूनियन कार्बाइड की एक हिस्सेदार थी. नौ साल पहले अमेरिका की ही दूसरी केमिकल कंपनी डाउ केमिकल्स यूनियन कार्बाइड को खरीद लेती है और हमारे देश के एक और महान उद्योगपति रतन टाटा उसकी सिफारिश करते हुए प्रधानमंत्री को पत्र लिखते हैं. भोपाल फैसले के बाद जो मंत्रिसमूह गठित किया गया है उसके मुखिया बनाये गये हैं पी चिदम्बरम. पिछली यूपीए सरकार में जब वे वित्तमंत्री थे तो उन्होंने प्रधानंत्री को डाउ केमिकल्स की सिफारिश करते हुए पत्र लिखा था. तर्क यह कि डाउ केमिकल्स ने यूनियन कार्बाइड का जो अधिग्रहण किया है उसमें भोपाल संयत्र शामिल नहीं है. अब तो वह यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन अस्तित्व में ही नहीं है जिसे अपराधी मानकर फैसला सुनाया गया है. जो मंत्रिसमूह गठित किया गया है उसमें औद्योगिक घरानों के हिमायती हैं इसलिए वे इस फैसले के बारे में क्या राय देंगे इसे समझने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए. और जब तक हाइकोर्ट में अपील की जाएगी, सुनवाई दोबारा शुरू की जाएगी अगले दस पंद्रह साल और गुजर जाएंगे और तब तक तो वारेन एंडरसन भी शायद न रहें और वे लोग भी जिन्हें दो दो साल की सजा देकर "उपकृत" किया गया है.
अब आप किसे दोषी मानेंगे? किससे न्याय की उम्मीद करेंगे? जो मर गये वे तो तर गये जो आज भी भोपाल का दंश झेल रहे हैं वे कौड़ी दो कौड़ी पाकर ही अपना दुख दर्द कम कर लेना चाहते हैं और मान लेना चाहते हैं कि वे दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं. लेकिन यह लोकतंत्र खास लोगों और खास देशों की सेवा में इतनी गंभीरता से तल्लीन है जो नागरिकों में भी अमीर गरीब का भयानक भेदभाव करती है. अब भी आप यही मानेंगे कि एंडरनसन और यूनियन कार्बाइड दोषी है? अगर वे दोषी हैं तो उन्हें यह अपराध करने का मौका किसने दिया? फैसला आपको करना हो तो किसे ज्यादा सख्त सजा देंगे?
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कीन्हें प्राकृतजन गुन गाना
सिर धुनि गिरा लागि पछिताना
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और अब भी बहुत नटवर सिंह बाकि है, जो की भोपाल गैस कांड या ऊपर पुष्कर जी ने लिखा है वैसे "राजीव गाँधी गैस लीकेज योजना" के तहत बकरे बनाये जायेंगे! और राज निति में यह जरुरी भी है, वर्ना मेडम जी, प्रधान मंत्री जी और बहुत लोगों को इस्तीफा देनेसे रोकने के लिए भी तो बकरे चाहिए ना? और कुछ बकरे अपनी मर्जी से अपनी गर्दन तलवार के नीच भी रख देंगे!
सब से बड़ी दुःख की बात यह है की जनता की याददास्त बहुत कमजोर होती है, और उसी का फायदा उठाते है यह राज्नितिग्य!
दूसरी अहेम बात यह भी है की भारत की कोर्ट ने जो फेसला २५ साल के बाद सुनाया है भोपाल गैस कांड के केस में, वह अगर उसी वक्त (२५ साल पहले गैस कांड हुआ तब) सुनाया जाता तो क्या यह कोर्ट के फैसले के तहत विदेशी (अमेरिकेन) एंडरसन वगेरह दोषी लोगों को फांसी पर लटका ने की ताकत रखती है हमारी सरकार?
यह सिर्फ एक तमाशा है, जिस में आखिरकार कोई ना कोई बकरा फांसी के फंदे के लिए तैयार कर ही दिया जाये गा!
साथ ही साथ आइ पी एल के गफ्ले में से श्री शरद राव पवार जी को कितनी राहत मिलेगी? और शरद पवार जी को हटाने के लिए असमर्थ यु पी ऐ सरकार को भी कितनी राहत मिल गयी हे? यह सोचा हे किसीने? और सचमुच "इसे कहते हे राजनीति!!!"
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