न्याय के नाम पर न करें राजनीति
विगत कुछ दिनों से जो पूरा देश देख रहा है और सुन रहा है, वह भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों के जख्मों पर नमक छिड़कने के समान है या यॅंू कहा जाए कि जख्मों को नमक-मिर्च लगे खंजर से कुरेदा और गहरा किया रहा है तो गलत नहीं होगा। गला फाड़कर चिल्लाने वाला मीडिया, भोपाल में डेरा डाले बड़े-बड़े चैनलों के सूट-बूट वाले तथाकथित बड़े पत्रकार, एक दूसरे पर भोपाल से दिल्ली तक कीचड़ उछालते, वो तमाम राजनेतागण, अफसोस कि आप सब ने भोपाल के दर्द को अपनी राजनीति की दुकान में बदल दिया है । क्या आप सब पिछले पच्चीस बरसों से सो रहे थे? या मूक दर्शक बने इस बात का इंतजार कर रहे थे, कि कब मौका आये और हम इसे अपने-अपने हितों के अनुरूप इस अवसर को भुनायें ।
बड़ा सवाल यह नहीं होना चाहिए कि आरोपी ऐंडरसन कैसे भगा ? सवाल यह होना चाहिए कि क्या पिछले पच्चीस सालों में हमने ऐसा कुछ किया है, कि आगे देश में और ”एक भोपाल” न बन पाये, शायद नहीं । आज भी देश में तमाम भ्रष्ट नेताओं और अफसरों का गठजोड़ है जो बहुत सशक्त होकर जनता के हित को नजर अंदाज कर अपनी जेबें भर रहा है । भोपाल सहित देश में अनेकों स्थानों पर ऐसे कारखानें और फैक्ट्रियां संचालित हैं जो कभी भी यमदूतों के रूप में प्रकट होकर गरीब जनता की जान ले सकते हैं । यह सब अमानवीय एवं गैर-कानूनी होने के साथ-साथ बिगड़ते पर्यावरण के लिए और घातक है । चाहे केन्द्र की सरकार हो या राज्य की, सब के सब इन कारखानों से ऑंख मूंदकर बैठे हैं ।
आज भोपाल के गैस पीड़ितों के लिए शोर मचा रहे सब लोग अपने गिरेबान में झांके और यह सोचें कि पिछले पच्चीस वर्षों में उन्होंने गैस-पीड़ितों के कल्याण के लिए अपनी ओर से कौन सा विशेष कार्य किया है ? ऐसा नहीं है कि इस पूरे प्रकरण में जो भी लीपा-पोती हुई है वह आज की है, न ही आज इस प्रकरण में कोई नये सबूत या गवाह जोड़े या घटाये गये हैं । वह तो सब 7 दिसम्बर 1984 को ही किया जा चुका था, जिस दिन इस देश से एंडरसन को भगाने का षडयंत्र रचा गया। गड़बड़ तो तभी हो चुकी थी जब देश के सर्वोच्च न्याय मंदिर के प्रमुख ने कानूनी धाराओं का प्रवाह कम कर एंडरसन सहित अन्य आरोपियों के बच निकलने या नाममात्र का दंड पाने का रास्ता बना दिया था । फिर इस सब को लेकर इतनी राजनीतिक दांव-पेंच आज क्यों । यह सब तो बहुत पहले ही किया जाना चाहिये था ताकि इतने लंबे समय के बाद गैस पीड़ितों को कोई सार्थक परिणाम प्राप्त हो पाता । पर शायद राजनीति इतनी ही घिनौनी है कि जब मुद्दा सामने आये तभी उस पर राजनीति करो ।
एंडरसन को सजा से गैस पीड़ितों को मानसिक संतोष जरूर प्राप्त हो सकता था पर उससे भी ज्यादा आवश्यक है, कि इन गैस पीड़ितों को शारीरिक, सामाजिक और आर्थिक पुनुरूत्थान प्रदान किया जाये । केन्द्र सरकार और राज्य सरकार मिल कर इस बात की जांच करें कि क्या सचमुच यूनियन कार्बाइड भोपाल के आस-पास का भूमिगत जल दूषित व प्रदूषित है या सिर्फ यह कोरी अफवाह है । कैसे कोई संस्था वैज्ञानिक आधार पर यह दावा कर सकती है कि पानी दूषित है वहीं राज्य सरकार कहती है कि ऐसा कुछ भी नहीं है, यूनियन कार्बाइड के आसपास का पानी बिल्कुल स्वच्छ है। हैरानी और दुख की बात है कि इन बिंदुओं पर आज तक मजबूती से कुछ भी नहीं हुआ है ।
गैस पीड़ितों के स्वास्थ कल्याण के लिए निर्मित भोपाल मेमोरियल अस्पताल ट्रस्टियों और वहां कार्यरत डॉक्टरों के आपसी झगड़े का मंच बन गया है । कौन, कब और कैसे इस ट्रस्ट का प्रमुख और सदस्य बन गया, यह आज भी भोपाल के 6 लाख गैस पीड़ितों को पता ही नहीं है । क्यों और किस के दबाव में अच्छे बड़े चिकित्सों ने इस अस्पताल से किनारा कर लिया, इसका उत्तर किसी के पास नहीं है । ट्रस्ट के प्रमुख और अन्य सदस्य का क्या उत्तरदायित्व है यह कोई नहीं जानता, न गैस पीड़ित, न केन्द्र सरकार और न ही राज्य सरकार । हॉं जब भी मौका मिला इन सरकारों पर काबिज राजनेताओं ने अपने विरोधियों के खिलाफ गैस पीड़ितों के मुद्दे को सदा ही इस्तेमाल किया, ऐसा ही कुछ वर्तमान में भी हो रहा है ।
क्या इससे बड़ा भी कुछ अन्याय हो सकता है कि जिन्हें मौत ने बक्श दिया, उनका दम सरकार और भोपाल मेमोरियल ट्रस्ट अस्पताल निकालें । न जाने इस अन्याय और शोषण के खिलाफ कब ऐसी आवाज उठेगी कि बचे हुए बीमार गैस पीड़ितों को न्याय मिल सके। इस सारे घटनाक्रम में गैस-पीड़ितों के कल्याण के नाम पर काम कर रहे, स्वयंसेवी संगठन भी सवालों के दायरे में हैं । इन सब की भूमिका और कार्यशैली संतोषजनक नहीं है, ऐसा लगता है कि यह गैस पीड़ित उन आतंकी नक्सलियों से भी गये-गुजरे हो गए जिनके पक्ष में कोई राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर का बड़ा नाम जेल जाने को तैयार हो ।
कैंसर, किडनी, दमा, लगातार खांसी और कफ, दृष्टीहीनता, भूख में कमी, महिलाओं के मासिक चक्र में अनियमितता, लगातार बुखार, थकान, बदन दर्द जैसी बीमारियों के साथ-साथ जन्म के समय अनुवंशिक दोष या अपर्याप्त विकसित बच्चे आदि वह यह सब सौगातें हैं जो गैस कांड इन्हें दे गया है । यह सब उस दिन के बाद से आज तक पैदा होने वाली तीसरी पीढ़ी को भी स्थांतरित हो रहा है । इनका न्याय कौन करेगा ? क्या इस सब में भी एंडरसन का दोष है ? या फिर अमेरिका का दबाव कि इन छह लाख लोगों को उनके हाल पर छोड़ दो । यह तो सब हमारी और आपकी केन्द्र व राज्य सरकारों का दायित्व है जिसे उन्होंने ईमानदारी से पूरा नहीं किया है ।
भोपाल मेमोरियल हास्पिटल में अब प्राथमिकता गैस पीड़ित को नहीं है, उस ट्रस्ट ने अमानवीय होकर मजबूर गैस पीड़ितों से ज्यादा प्राथमिकता उनको देनी शुरू कर दी है जो उनसे ज्यादा आर्थिक रूप से मजबूत हैं और पैसे देकर अपना इलाज कराने में सक्षम हैं । क्या इस और सरकारों का ध्यान नहीं जाता ? क्या वो ट्रस्ट और उसके कर्ताधर्ता सब नियम कायदे-कानूनों से उपर हैं ? क्या उन पर किसी सरकार का भी नियंत्रण नहीं? एक आंकलन के मुताबिक छह लाख गैस पीड़ितों में से लगभग पच्चीस प्रतिशत गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं जो सम्पूर्ण उपचार के अभाव में हर माह 10 से 15 व्यक्ति के औसत से मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं । आज पच्चीस वर्ष बाद भी हम उन्हें मानसिक न्याय नहीं दे सके, लेकिन हमें उन्हें स्वास्थ रूपी शारीरिक न्याय, रोजगार और शिक्षा रूपी आर्थिक न्याय तो दे ही सकते हैं, जिसके लिए हमें किसी कानून की धारा को बढ़ाने या घटाने की आवश्यकता नहीं है बस आवश्यकता है तो मजबूत और निस्वार्थ राजनीतिक इच्छाशक्ति की जो इन गैस पीड़ितों का दर्द समझ सके ।
इस घटना ने पर्यावरण को बुरी तरह से प्रभावित किया है । गैस कांड के बाद प्रभावित क्षेत्रों के पेड़ कुछ ही दिनों में पत्ते विहीन हो गये थे । नैफथाल, नैफथिलिन, पारा, क्रोमियम, तांबा, निकिल, लेड, हैक्सा क्लोरो ईथेन जैसे पर्यावरण को क्षति पहॅंुचाने वाले तत्व आज भी उस स्थान पर मौजूद हैं जिसका स्वामित्व डाव केमिकल्स (पूर्व में यूनियन कार्बाइड) के पास है। हम दुर्घटना के अतिरिक्त पर्यावरण क्षति के आधार पर भी कानूनी दिशा में कार्यवाही कर सकते हैं । पर इस दिशा में भी कोई ध्यान नहीं दिया गया । आशा है कि भारत का बहुसंख्यक युवा वर्ग और युवा नेतृत्व शायद इस दिशा में कुछ सार्थक करे ।
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PANKAJ CHATURVEDI
चाचा - अम्मा से बोले , कल बाजार जाना है । जा हमारी भैस बेकार हो गयी , अगर जुगाड़ बनो तो नयी भैस ले आयेगे । तू चले तो हमारे संग चले चल । तू भी बाजार घूम लिओ । अगले दिन चाचा और अम्मा अपने सर पर चावल की बोरी रख कर पास की बाजार जा धमके । दोनों ने मिलकर भैस खरीदी ,जो दुध दे रही थी। चाचा आगे और अम्मा पीछे- पीछे भैस हाकते चले आ रहे थे । जो भी रास्ते मिलता , वह जरुर कहता क़ी अरे नयी भैस खरीदी है । चाचा तिलमिलाकर जवाब देते अरे ससुर के नाती जा भैस नयी नहीं है । जा तो ५ साल की हो गयी है तुमे नयी और पुरानी भैस की पहचान तक नहीं है । जैसे तैसे करके भैस घर लाकर खूटे से बांध दी । चाचा रात को भैस का दुध निकालने बैठे थे. कि चाचा के पिछवाड़े पर भैस ने लात मार दी । चाचा की चीख निकल पड़ी। बोले - सारे ने भैस को नजर मार दाई है । जा तो बात बात पर विदक रही है । हम तो लुट गए है । चाचा अम्मा से बोले । मैंने तोसे कही थी , हम बाजार से भैस पर कालो कपडा गेर कर घर तक लायेगे । ले बैठ कर दुध पी।
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